ये सवाल सोचने को मजबूर कर गई प्रत्युषा बनर्जी



बालिका वधु में ‘आनंदी’ का किरदार निभाने वाली प्रत्युषा बनर्जी की संदिग्ध परिस्थियों में हुई मौत के बाद, फिल्मी सितारों की आत्महत्या की वजह को लेकर एक बार फिर से बहस छिड़ गई है.

ज्यादातर लोग प्रेम में धोका मिलने को कारण बता रहे हैं. जबकि कई लोगों का कहना है कि फिल्म जगत में ये आत्महत्या का पहला मामला नहीं है, बल्कि इससे पहले परवीन बॉबी, दिव्या भारती, सिल्क स्मिता, कुलजीत रन्धावा और  जिया खान जैसी अभिनेत्री/मॉडल के नाम हैं,  जिन्होंने आत्महत्या की या मारी गईं. जिनपर ख़बर बनी, कुछ पर फिल्म भी बनी, लेकिन समय के साथ सबको भुला दिया गया.

वहीं कुछ जानकारों का कहना है कि इन घटनाओं के मूल में एक्टिंग स्कूल और फिल्म जगत में ऐसे मनोचिकित्सकों का न होना है, जो अभिनेत्री/अभिनेता को यह बता सके कि अभिनय के समय कैसे और कितने समय तक वे किरदार में जाएं और कब और कैसे बाहर निकलें.

कई बार अभिनेत्री अभिनेता रीयल और रील लाइफ के महीम फर्क को भूल जाते हैं और अवसाद में चले जाते हैं कई बार डायरेक्टर का व्यवहार इतना अमानवीय होता है कि कलाकार अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं.

तर्क तो यह भी दिए जा रहे हैं कि अभिनय में जीवन्तता लाने के लिए जानबूझ कर ऐसी स्क्रिप्ट लिखी जाती है जिससे दर्शक भावुक हो जाएं. जबकि एक लम्बे समय तक भावनात्मक दृश्य कर रहे कलाकार खुद को रील लाइफ से बाहर निकालने के लिए नाइट क्लब, शराब, ड्रग्स और दोस्तो का सहारा लेते हैं. इमोशनल और प्रोफेस्नल लाइफ के बीच जूझ रहे इन कलाकारों को सहारा देने वाला सच्चा दोस्त तो बमुश्किल मिलता है, लेकिन उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर अपना मतलब निकालने वाले बहुत से लोग मिल जाते हैं. इसका ख़ामियाजा रीयल और रील लाइफ के बीच दोलन कर रहे अभिनेत्री/अभिनेता को चुकाना पड़ता है.

स्थिति तब और विकट हो जाती है जबकि मां बाप और घर-परिवार के लोग कलाकार को भावनाओं को नज़रअंदाज कर उसे केवल अभिनेत्री/अभिनेता समझ उससे धन और भौतिक जरूरत तक ही सीमित रहते हैं.

इस जीवन संघर्ष के दौरान ऐसा भी समय आता हो जब रीयल लाइफ में एक भावुक महिला के किरदार को जी रही अभिनेत्री, अपने जीवन में महिला के रूप में खुद को भावनात्कर तौर पर निर्पट अकेला पाती है. और इस वक्त में वह भावानात्कम छणों में अपने द्वारा उठाये कदम को, समाज में अस्वीकार्य मानते हुए मौत का रास्ता अख्तियार कर देती है या ऐसा करने के लिए साजिश के तहत मजबूर की जाती है.

 

ऐसे में सवाल उठता है कि जो अभिनेत्री समाज को अभिनय के जरिए आईना बता रहे होती हैं, महिला के तौर पर उनकी भावनाओं को संतुलित रखने या उनके एकाकी पन को समझने के लिए सरकार, समाज और फिल्म/टीवी जगत क्या सकारात्मक पहल कर रहा है?
दूसरा सवाल, इन अभिनेत्रियों के रीयल लाइफ में एक महिला होने के जीवंत किरदार को क्यों यह समाज स्वीकार नहीं कर पाता?
तीसरा, क्यों इन स्वतंत्र सोच के परिंदों को समाज के बुने ताने बाने में रहने के लिए मजबूर किया जाता है वह भी तब जबकि वे भावनात्मकता के सभी पड़ावों को पार कर अपनी एक अलग ही दुनिया बना चुकी होती हैं?
चौथा सवाल, क्यों उनसे एक आम लड़की की तरह अपेक्षाएं रखी जाती हैं, जबकि वह अभिनय के जरिए अपने खास व्यक्तित्व को साबित कर चुकी होती है?
आखिरी और सबसे महत्वपूर्ण सवाल, क्या आज लड़कियों के मानसिक और शारीरिक स्तर पर मजबूत करने की जरूरत नहीं? क्या उन्हें किसी भी परिवेश या क्षेत्र में संघर्ष करने योग्य बनाने की जरूरत नहीं?

 

 

 

 

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