आर्थिक रूप से सशक्त महिलाएं हैं परिवार की मुखिया



भारत के कई ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को घर का मुखिया नहीं माना जाता। ताजा आंकड़ों के अनुसार देश के ग्रामीण इलाकों में केवल 12.83 फीसदी परिवार ऐसे हैं जिनकी मुखिया महिलाएं हैं।

सामाजिक-आर्थिक व जातिगत जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि दक्षिण भारत के मुकाबले उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में महिला मुखिया परिवारों की संख्या राष्ट्रीय औसत से नीचे है। पहाड़ी राज्यों उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की स्थिति मैदानी राज्यों की तुलना में थोड़ी बेहतर है। मैदानी राज्यों में जनसंख्या की दृष्टि से देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में महिला मुखिया परिवार 10.48 फीसदी हैं। वहीं बिहार में 10 फीसदी से भी कम 9.69 फीसदी परिवार ऐसे हैं जहां महिलाओं को मुखिया माना जाता है। राजधानी दिल्ली में 8.96 फीसदी, जबकि इससे लगे राज्य राजस्थान और हरियाणा में क्रमश: 8.98, 11.73 फीसदी महिला मुखिया परिवार हैं। जम्मू-कश्मीर में 9.69 फीसदी परिवारों की मुखिया महिला हैं।

देश में लक्षद्वीप ऐसा राज्य है जहां के 40.64 फीसदी ग्रामीण परिवारों में महिलाएं मुखिया हैं। इसके बाद केरल का नंबर आता है। यहां महिला मुखिया परिवार 26.25 फीसदी हैं। गोवा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में ऐसे ग्रामीण परिवारों की संख्या क्रमश: 24.76, 21.57, 21.53 फीसदी है जिनकी मुखिया महिलाएं हैं।

इन आंकड़ों से देश के ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की आर्थिक और सामाजिक स्थिति का आकलन कर सकते हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो पायेंगे कि जिन राज्यों में महिला मुखिया परिवारों की संख्या कम है, सामाजिक तौर पर उन्हीं राज्यों में महिलाओं पर बंदिश अधिक हैं। इन राज्यों के ग्रामीण इलाकों में महिलाएं घूंघट या बुरक़ा पहन कर रहने को बाध्य हैं। इन महिलाओं को आर्थिक रूप से घर के मुखिया पुरुष पर निर्भर रहना पड़ता है। केवल मजदूरी करने वाली महिलाएं ही इन ग्रामीण इलाकों में घर से अकेले बाहर निकलती हैं। अन्य कोई भी महिला घर से अकेले बाहर नहीं जा सकती। इसके सामाजिक और पारंपरिक दोनों ही कारण हैं। यही वहज है कि इन इलाकों में महिलाएं आर्थिक, मानसिक और शारीरिक तौर पर कमजोर हो जाती हैं। उन्हें अर्थ के अभाव में चार दीवारों के भीतर बंद रहने को मजबूर कर दिया जाता है। इन इलाकों में अब भी महिलाओं को उच्च शिक्षा नहीं दी जाती। न ही किसी कार्य में उनसे सहमति लेने की जरूरत समझी जाती है। ये महिलाएं दीवार के पीछे रहकर, मुंह से कुछ न कहकर, केवल सिर हिलाने को मजबूर होती हैं।

वहीं इनकी तुलना में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गोवा, पंजाब, लक्षद्वीप, केरल जैसे राज्यों के ग्रामीण इलाकों में महिलाएं आत्मनिर्भर हैं। केरल की ज्यादातर महिलाएं स्वास्थ्य सेवा में कार्यरत हैं, जबकि अन्य राज्यों की महिलाएं खेती और लघु उद्योग में प्रमुख भूमिका अदा कर रही हैं।  यहां की महिलाएं आर्थिक तौर पर सशक्त हैं। महिलाएं परिवार में हो रहे कार्यों में निर्णायक और सलाहकार की  प्रमुख भूमिका में होती हैं।

देखा जाए तो पहाड़ी राज्य उत्तराखंड और हिमाचल का कृषि उद्योग महिलाओं की कठिन मेहनत पर ही टिका है। सामाजिक बंदिशें नहीं होने के कारण इन इलाकों की महिलाएं अपने दम पर आर्थिक रूप से मजबूत हैं। इसका सीधा प्रभाव उनकी पारिवारिक और सामाजिक महत्ता पर पड़ता है। वे मुखिया होने की हर कसौटी पर खरी उतरती हैं। और स्थिति अनुसार उन्हें सम्मान पूर्वक मुखिया की भूमिका में स्वीकार किया जाता हैं।

देश की सामाजिक व्यवस्था की नीव काफी हद तक अर्थ व्यवस्था पर टिकी है। ऐसे में जिन ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को घूंघट में और बुरक़ा पहन कर रहना पड़े। अकेले घर की दहलीज़ पार न करने की बंदिश हो, तो वहां महिलाओं को कोई क्या मुखिया मानेगा! महिलाओं का सामाजिक और आर्थित स्तर पर स्वतंत्र नहीं होना उन्हें ग्रामीण इलाकों में मुखिया न माने जाने का संभवत: प्रमुख कारण है।

महिला को मुखिया के तौर पर स्वीकार न करने के कारण उसका आर्थिक रूप से कमजोर होना है। अर्थ के अभाव में महिला पारिवारिक और सामाजिक स्तर पर कमजोर कर दी जाती है। महिलाओं को सशक्त होने के लिए पहले उनका शिक्षित होना जरूरी है। शिक्षित होने से महिलाओं का आत्मबल मजबूत होगा। महिलाओं को सही और गलत का पता लग पायेगा। वे समझ पायेंगी कि उनके लिए सही क्या है, और क्या गलत।

इसके लिए जरूरी है कि सरकार जमीनी तौर पर महिलाओं को आर्थिक तौर पर सशक्त करने की योजनाएं बनाए। जो महिलाएं बंदिशों के चलते घर से बाहर नहीं आ सकती, उनके घर तक योजनाओं को ले पहुंचाए। उन्हें समाज से जोड़ें और उनकी भूमिका सुनिश्चित कर सशक्त बनाया जाये।

कोई महिला परिवार की मुखिया न भी बने, लेकिन वह इतनी आत्मनिर्भर जरूर हो कि समय आने पर अपना और अपने परिवार का सम्मान पूर्वक पालन-पोषण कर सके।

- चारु लता कुमेड़ी

 

 

 

 

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