आपकी जागरूकता से नहीं होंगे गेंगरेप, बेखौफ़ घूम सकेंगी बेटियां



आय दिन देश के किसी न किसी कोने में रेप और गेंगरेप की घटनाएं सुर्खियों में हैं. हाल के दिनों में गेंगरेप के बाद लड़की की हत्या कर देने के कई मामले सामने आये हैं. इन घटनाओं से लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर यह सवाल मजबूती से खड़े होते हैं कि आखिर ऐसा क्या किया जाए, जिससे लड़कियां और महिलाएं भी बेखौफ़ जीवन जी सकें? और विकृत मानसिकता के लोग कुकृत्य को करने से पहले हजार बार सोचें. समाज और सरकार मिलकर काम करे तो इन सवालों हल तलाशा जा सकता है.

देखा जाए तो, घटनाएं समाज में होती है. समाज, लोगों से बनता है. लोगों में ऐसी जागरुकता पैदा करने की जरूरत है, जिससे वे इस तरह की घटना को होने से रोकें. वे व्यक्तिगत तौर पर महिलाओं और बच्चियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेने में सक्षम बने. साथ ही लड़कियों को इतना आत्मनिर्भर और इन परिस्थितियों से बच कर निकलने लायक.
ऐसी स्थितियों से निपटने के लिए, सबसे पहले समाज में उन व्यक्तियों की पहचान करने की जरूरत है जो ऐसी घटनाओं को अन्जाम देने की मानसिकता रखते हैं. परिवार और परिवार के बाहर ऐसी सोच के व्यक्तियों को चिन्हित किया जाए, क्योंकि कोई भी व्यक्ति एक दम अपराधी नहीं बनता.

मनोविज्ञान के अनुसार, ऐसी घटनाओं को अन्जाम देने वाला व्यक्ति हर पल, हर दिन नकारात्मकता की ओर प्रेरित होता है. वह आस-पास ऐसा माहौल तैयार करता है, या फिर ऐसी माहौल में रहना पसंद करता है, जहां महिलाओं के प्रति हीन विचारों और कामुक अभिव्यक्ति को पनपने का मौका मिलता हो.
ऐसे लोग अपने परिवार और आस-पड़ोस में मौका पाने पर, धीरे-धीरे इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने की ताक में रहते हैं, जिसे परिवार और पड़ोस के लोग नज़रअंदाज करते हैं या वे अपराधी की गतिविधियों पर ध्यान नहीं देते. इसी का विकराल रूप बलात्कार के तौर पर सामने आता है.
ऐसे में यदि गांव, शहर में रह रहे प्रत्येक परिवार इस तरह की कु-मानसिकता रखने वाले लोगों को नज़रअंदाज करने के बजाए, गंभीरता से लें, तो मनचलों का जीना दूभर हो जाएगा. ऐसी स्थिति में विकृत मानसिकता के व्यक्ति पहले तो गांव छोड़ देंगे, फिर शहर और जब शहर में भी इन पर कड़ी नज़र रखी जाएगी तो ये जरूर ही अपनी सोच बदल देने को मजबूर हो जाएंगे.

पुलिस और जन प्रतिनिधियों को इस ओर गंभीरता से सोचने और कदम उठाने की जरूरत है. क्योंकि जनता, को जब तक शासन और नेता का सहयोग नहीं मिलता वह तब तक वह आंख पर पट्टी बांधे चुपचाप तमाशा देखने को अपनी किस्मत समझने लगती है. आज जरूरत है उस पट्टी को आंखों से निकाल फेंकने की. समाज में कुकुरमुत्तों की तरह पनप रही इस गंदगी को समाप्त करने की. यहां पर इस घृणित विचार और सोच को समाप्त करने की बात की जा रही है. जब तक समाज और शासन तंत्र महिला का सम्मान और सहयोग नहीं करेगा, तब तक ऐसे कुकृत्यों को रोका जाना असंभव है. इसके लिए परिवार, गांव, शहर और देश में ऐसा महौल तैयार करने की जरूरत है जिससे महिला को सम्मान की दृष्टि से देखा जाए. न की शारीरिक जरूरत की सामग्री के तौर पर. साथ ही नकारात्मकता की ओर बढ़ रहे युवाओं को सही मार्गदर्शन और रचनात्मकता की ओर प्रेरित करना भी आवश्यक है. क्योंकि अपराध, अभाव, गरीबी और गैर-जिम्मेदारी की कोख में ही जन्म लेता है. क्या आप तैयार हैं इस मुहीम के लिए?

चारु लता

 

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